Saturday

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मैदानों पगडंडियों में बिछी घास
धूप के थपेड़ों में झुलसती है।
कहीं पुआल की शक्ल में धू-धू कर जलती है
फिर भी धरती की गहराइयों में
छिपा कर रखती है अपना वजूद
कि कभी तो मौसम का मिजाज रूमानी होगा और...........
कुछ इसी तरह हमारे वे सपने
जो तमाम जद्दोज़हद के बावजूद,
जो बरगद नहीं बन पाते
दबाए रखते हैं अपनी जड़ों को कहीं गहरे में

क्योंकि मौसम का बदलना तय है और हालात का भी़……………

Monday

सुबह!!!

     कल सारा  दिन
     बंजर धरती सा
     चटकता रहा,
     राह भूली बंजारन  सा  
     यहाँ -वहाँ भटकता रहा 
     और रात,
      दर्द के  उलझे  धागों से 
      कहानियाँ बुनती रही ,
      टूटे  सपनों के दरिन्दों से
     मिल साजिशें रचती रही .
      पर जब आँख खुली तो,
     सुबह मेरे सिरहाने बैठ ,
     किरण -किरण सींच कर 
     उजालों के बीज रोप रही थी.

Sunday

स्वागत है, तुम्हारा नवागत हे नए वर्ष











काट बीते वर्ष की फसल
अतीत के खलिहान में रख,
खोल द्वार दिशाओं के
चल पड़ा सूरज
हाँक समय का रथ.

भोर की किरणें
लिख गयीं पर्वत शिखरों पर
प्रशस्ति पत्र,
स्वागत है, तुम्हारा नवागत
हे नए वर्ष,
हों नए-नए विमर्श.

अब न लौटें दफ़न हो चुके
मृतक पराजय के क्षण,
दूर हो भ्रम के भूकम्पों का भय
हो आस्था का अभिनन्दन.

मुट्ठी भर पलों के बीज
कर दें धरती का श्रृंगार,
रचें शिल्प उच्चतम आदर्शों के
शिल्पी मानव के हाथ. 

झलक उठें हर अंतर में
रचयिता की दृष्टि का उत्कर्ष,
स्वागत हैं, तुम्हारा नवागत
हे नए वर्ष,
हों नए-नए विमर्श...