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मैं औरत.....

मेरे आस-पास की औरतें
अब बदल रहीं हैं,
औरतपन बरक़रार रखते हुए भी,
अपना अलग इतिहास लिख रहीं हैं,
मेरे आस-पास की औरतें
अब बेटियों को अपनी,
उतरन की विरासत सोंपने की बजाय
नया लिबास गढ़ते हुए
उसकी आंखों में
अपने सपने भर रहीं हैं,
मेरे आस-पास की औरतें
जो काली परछाइयों सी
दीवारों पर लटकी थीं,
अब दिन के उजाले में
वजूद का अहसास दिला रहीं हैं,
मेरे आस-पास की औरतें
बड़ी पापड़ सुखाते हुए,
रगड़ रगड़ कढ़ाई चमकाते हुए,
सजती निखरती हुई,
आईने में ख़ुद को देख इतरा रहीं हैं,
मेरे आस-पास की औरतें
इतना सब होते हुए भी
हर बारिश के बाद
परम्पराओं की संदूकची से
संस्कारों के पुराने कपड़े निकाल
धूप दिखा रहीं हैं ।
महिला दिवस 09

9 comments:

डॉ .अनुराग said...

मेरे आस-पास की औरतें
इतना सब होते हुए भी
हर बारिश के बाद
परम्पराओं की संदूकची से
संस्कारों के पुराने कपड़े निकाल
धूप दिखा रहीं हैं ।

adbhut !jo kahna chah rahi hai uska tareeka khasa dilchasp hai aor gahra arth chipaaye hue hai .aapki pichli kavita padhne ke baad se hi aapki ek khas shaily aor aapke vyaktitv ka nadaja ho gaya tha ...jaan gaya tha ki koi sadaharan likhne vaali nahi hai..meri umeede ab aor badh gayi hai.

सुजाता said...

बहुत अच्छे मोना जी , कविता मे धार और तेज़ हो यही कामना है!

सुजाता said...

इसे देखें
http://blog.chokherbali.in/2009/03/blog-post_09.html

अल्पना वर्मा said...

abhut achcha likhti hain aap.
और धीरे धीरे मरता दिन
रात का कफ़न ओढ़ सो जाता है,
खंडहर की एक ईंट और गिर जाती है।
behad khubsurat panktiyan.

[aaj aap mere blog par aayin,dhnywaad]

amitabhpriyadarshi said...

औरतें

उतरन की विरासत सोंपने की बजाय
नया लिबास गढ़ते हुए

उसकी आंखों में

अपने सपने भर रहीं हैं,
मेरे आस-पास की औरतें


इंतज़ार

गौरैया जानती है उड़ना सीखने पर,
परिंदे नहीं लौटा करते घोंसलों की ओर
पर बूढी आँखें समझते हुए भी
नहीं छोड़ती हरकारे का इंतज़ार।

dono rachanaayen samaaj ko ingit karti hui, isko samjhaane ka prayaas kafi achha laga.
khas kar auraten ki uparyukt panktiyaan.

khali panne

aliya said...

hmari bhu kitni syani hai ya humhe pta hi na tha. bhut hi bdiya.dil se bdhai aur bora bhar aashirwad.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

मेरे आस-पास की औरतें
अब बदल रहीं हैं,
औरतपन बरक़रार रखते हुए भी,
अपना अलग इतिहास लिख रहीं हैं,

सही एक अलग अंदाज है आपके कहने का जो सरल होते हुए भी गहरे अर्थ दे जाता है ..लिखती रहे यूँ ही...

दिलीप कवठेकर said...

बेहद सरल अंदाज़ बात कहने का, मगर गूढ अर्थ.

आपकी उपमायें दिल को लुभा गयीं. सकारात्मकता के छाते तले इन पंक्तियों में परंपराओं को नकारा नहीं गया है, ये मेरे लिये विशेष बात. अपना अलग इतिहास लिखना ज़रूरी है नारी को, मगर इतिहास को भूले बिना हो तो गलत क्या है, अगर इससे एक समृद्ध भविष्य के चरित्र का निर्माण करे नारी, एक मां बन कर, या किसे भी रोल में.

सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

पहली बार आपके ब्लॉग पर आया और आक्प्की कविताओं ने मन खुश कर दिया.
बहुत ख़ूबसूरत लिखती हैं आप.
मेरी शुभकामनाएं .