Thursday

शाखाओं के रिश्ते


कभी एक छत के नीचे रहे लोग
मिला करते हैं अब भी कभी-कभी
उसी छत के तले
मजबूरियों की केंचुल से निकल,
दुनियादारी की गर्द में लिपटी
एक दूसरे की आँखों में
अपना अक्स टटोलते हैं
दीवारों की दरारों को
हथेलियों से ढंकते हुए,
छत को बचाए रखने के
ताम-झाम जुटाते हैं
और त्यौहार बीतते-बीतते
यह जानते हुए भी कि
कोई बारिश ढहा देगी
आपस में मिलने के
इस बहाने को भी,
लौट जाते हैं वापस
बोनसाई की डालों पर
लटके आशियानों में।

14 comments:

tarni kumar said...

mona ji aapki kavitaon ka koi jabab nahi aapke vichar prwah se mai kafi prabhawit hun

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सही तस्वीर बुनी है आपने लफ्जों से आज कल के रिश्ते के माहोल की ..बहुत पसंद आई यह रचना

Mumukshh Ki Rachanain said...

वर्तमान रिश्तों पर प्रकाश डालती एक खूबसूरत रचना जो दरारों को साफ दिखती है.

सुन्दर प्रयास, सुन्दर अभिव्यक्ति.

चन्द्र मोहन गुप्त
www.cmgupta.blogspot.com

ilesh said...

sundar abhivyakti

JHAROKHA said...

Mona ji,
aj ke samajik sambandhon men aane valee khatas ko ujagar kartee bhavpoorna rachna..badhai.aise hee likhtee rahiye.
Poonam

अमिताभ श्रीवास्तव said...

pahli baar aaya aapke blog par, aour ye achcha hi hua,shbdo ke jis ras ko paane ki chah me ab tak padhne aour padhte rahne ki jo aadat lagi hui he vo aapki rachnao se badastur bani rah sakti he. pahle mera dhnyavaad swikaar kare..
shakhao ke rishto ne vartmaan parmanvik rishto ki peer jatlaai to talaash subah ki me kalpna hi sahi kintu ek bebsi aour aashaao bhare artho ko vayakt kiya he..aour maa....darasal is subject par me koi tippani nahi de sakta..jitna likho, jitna samjho kam hi he..bahut khoobsoorat rachna he marmsparshi..is par sirf yahi ki " ishvar har knhi jaa nahi sakta isliye usne maa banai he."
main aourat..waah, bahut khoob..sachchai ko bhi shalinta se spasht kiya he jo naareebhav ke tahat hi he. ab intzaar...taare aour vishvaas ...ji padhna bekaar nahi gaya..sadhuvaad aapko..
abse jaroor aataa rahunga aapke blog par.

Harkirat Haqeer said...

कभी एक छत के नीचे रहे लोग
मिला करते हैं अब भी कभी-कभी
उसी छत के तले
मजबूरियों की केंचुल से निकल,
दुनियादारी की गर्द में लिपटी
एक दूसरे की आँखों में
अपना अक्स टटोलते हैं

सोचने पर मजबूर करती नज़्म....!
शब्दों का सुन्दर संयोजन .....!
एक सशक्त रचना......!!

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

"प्रदक्षिणा"जी,
कविता के लिए धन्यवाद.
कभी एक छत के नीचे रहे लोग ,
मिला करते हैं अब भी कभी-कभी.
वर्तमान समय के रिश्तों को कितनी सुन्दरता
से आपने शब्द दिये हैं,ये नये दौर की मजबूरी
है कि बस त्योहारों पर ही अपने लोग भी मिल
पाते हैं फ़िर वापस...
हर रविवार को नई ग़ज़ल अपने ब्लाग पर
डालता हूँ।मुझे यकीन है कि आप इन्हें जरूर
पसंद करेंगी....

डॉ .अनुराग said...

जीवन की आपाधापी में अब रिश्ते भी गुम हो रहे है जी......

अल्पना वर्मा said...

एक दूसरे की आँखों में
अपना अक्स टटोलते हैं
---
'लौट जाते हैं वापस
बोनसाई की डालों पर
लटके आशियानों में। '
बहुत खूब!
आज कल की भागती दौड़ती शहरी जिंदगी में मानव जीवन का 'सजीव चित्र प्रस्तुत कर दिया आप की कविता ने!

neera said...

अच्छी लगी आपकी यह कविता...

बादल१०२ said...

bahut aachi rachna hai aap ki,sabdo mai bahut kuch samet diya hai aap ne.

Udan Tashtari said...

एक ऐसे यथार्थ से जुड़ी रचना जो सब अहसासते हैं मगर लिखने की हिम्मत कम ही करते हैं.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

शहरी जीवन की त्रासदी का मार्मिक चित्रण